Wednesday, December 5, 2012
Sunday, December 2, 2012
मनुष्य
का बाह्य एवं भीतरी जीवन , भारतीय युवाओं के सन्दर्भ में
वस्तुतः मनुष्य का बाह्य और
उसका भीतरी जीवन एक जटिल और विवादास्पद विषय है . जिसका चिंतन प्रत्येक बुद्धिजीवी के लिए अनिवार्य
है . आज के मनुष्य का
बाह्य एवं भीतरी जीवन सुव्यस्थित और वैभवपूर्ण तो दिखता है किन्तु उसका भीतरी जीवन
से कतई मेल नहीं है .और इसी कारण हमारे भीतरी जीवन में निरंतर कष्ट होते रहते हैं . भारत में ऋषियों ने वास्तव में मनुष्य के भीतरी
जीवन को जानने का प्रयत्न करते हुए प्रकृति के भीतर का अनुसंधान किया था .
हम जब भी संसार में कोई कार्य
करते हैं तो हम कर्म के बाह्य जगत में होते हैं परन्तु इसके साथ ही हमारे भीतरी जीवन
में भी कार्य चलता रहता है , जिसे हम सदैव अनदेखा करते हैं . जबकि वास्तविकता यह है की हमारे बाह्य जगत के कार्य आतंरिक जगत को तथा आंतरिक
जगत के कार्य बाह्य जगत को प्रभावित करते हैं , और जिस व्यक्ति के बाह्य एवं भीतरी जगत के कार्यों
में संयोजन रहता है उसी का जीवन शांतिपूर्ण और वैभव पूर्ण रहता है .
मशीन का कोई भी भीतरी जीवन नहीं होता , बल्कि उसका कार्य बाह्य जगत को बदलना है और जब मशीन
इस प्रकार प्रयोग की जाती है तो उसकी कार्यकुशलता प्रभावित होती है किन्तु इसके विपरीत
मनुष्य का भीतरी जीवन होता है जब वह बाह्य जगत में कार्य करता है तब वह अधिक उत्तम
अथवा बुरी अवस्था में परिवर्तित होता है . प्रत्येक बाह्य कर्म मनुष्य के भीतर या मन पर एक विशिष्ट छाप छोड़ता है , संस्कृत में इसे संस्कार या वासना कहा जाता है . वास्तव में यदि मनुष्य को शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य
और जीवन की पूर्णता चाहिए तो उसे इन संस्कारों
को ठीक से पहचानना व समझना चाहिए .
मनुष्य के भीतर खोज का सिद्धांत ,विचारों की क्रियाशीलता से ही उत्पन्न होता है . वास्तव में क्रियाशील दृष्टिकोण से मनुष्य के रहस्यमय
भीतरी रूप के पास ही उसके जीवित रहने या नष्ट होने की कुंजी है . उसी प्रकार से आंतरिक तनाव या विकृतियाँ या आंतरिक
शान्ति , उसकी शक्ति व मुक्ति
की कुंजी है . आज वर्तमान मनुष्य
के अधिकतर कष्ट उसके बाह्य नहीं आन्तरिक जीवन से उत्पन्न होते हैं , ये कष्ट शारीरिक नहीं बल्कि मनो-शारीरिक होते हैं .
वास्तव में अध्ययन की सार्थकता प्रकृति की भीतरी व बाह्य एकता में सन्निहित
होती है और ऐसा ही अध्ययन हमें जीवन का पूर्ण तत्व प्रदान कर सकता है जिससे हमें मनोरोगों
व सामाजिक विकृतियों से लड़ने में सहायता प्राप्त होगी . वर्तमान अध्ययन एवं शिक्षा का उद्देश्य इसी दिशा
में निश्चित किया जाना चाहिए . वास्तव में भौतिक और बौद्धिक आयामों के पार की सतत शिक्षा
ही आध्यात्म और आध्यात्मिक वृद्धि है तथा यही शिक्षा एवं अध्ययन उसका आंतरिक जीवन के
प्रति सचेष्ट रहने की ओर उन्मुख करता है .
अपने आंतरिक जीवन से हमें इस उद्देश्य को प्रयोग में लाना होगा जैसे हम अपने
बाह्य जीवन में भौतिक विद्या या तकनिकी द्वारा भौतिक प्रकृति की उर्जाओं का उपयोग करते
हैं यथा तापीय ऊर्जा से विद्युत् उर्जा उससे आगे अणु ऊर्जा तक मनुष्य ने सभ्यता के
उच्चतम स्तर को प्राप्त किया है . मनुष्य के भीतरी जीवन की यही विद्या जो उर्जा के
साधनों को उपलब्ध कराती है उसी से मनुष्य की इस सभ्यता को स्वास्थ्य,शक्ति तथा स्थिरता
प्राप्त हो सकती है
मनुष्य का गहनतापूर्ण ज्ञान ही उसे पशुता व असहायता से मुक्ति दिलाकर धन्य या
महान बनाता है . जिस सभ्यता प्राप्त मनुष्य ने आदिमानव स्थिति की पशुवत अवस्था पर विजय
प्राप्त कर ली हो , क्या उसका पुनः वर्तमान
विलक्षण वैज्ञानिक उपलब्धियों के बावजूद भी पशुता की अवस्था में गिरना उचित होगा ?
वास्तव में हमें इस पशुवत वृत्ति पर विजय पाकर सच्ची स्वतंत्रता और गौरव की स्थापना
करनी होगी . वर्तमान समय में युवाओं और चिंतकों के समक्ष यह एक महान चुनौती है . भारतीय ऋषियों की विद्या व तकनिकी का यही योगदान
व सन्देश है कि “ हे मानव तुम अपने नियंत्रण के बाहर बाह्य व भीतरी शक्तियों के आधीन
पशु मत बने रहो बल्कि अध्यात्मिक वृद्धि के लिए अंतर्जगत में प्रकृति द्वारा दी गयी
छमता के उपयोग से इन शक्तियों को अपने नियंत्रण में ले आओ तथा यहीं और अभी मुक्त और
निर्भय बनों , मृत्यु के पश्चात् के जीवन में नहीं .” यदि हम मनुष्यों के भीतरी जीवन
का यह विज्ञान आज विकसित नहीं होता है तो हम अगले कुछ दशकों में अपेक्षा कर सकते हैं
की शांति व भावनात्मक स्थिरता प्राप्त करने हेतु सम्पूर्ण मानव समाज बाह्य सहायता पर
, विशेषकर अणु जीवशास्त्र पर निर्भरता के कारण एक पशुपालन छेत्र बन जाएगा .
मानवीय यांत्रिकी के छेत्र में जीवशास्त्र बहुत आगे बढ़ चुका है , यह मनुष्य
से कहता है की तुम सुखी व शांतिमय होना चाहते हो तो मेरी प्रयोगशाला में आओ , जो चाहते
हो वह तुम्हे दूंगा . आधुनिक जीवशास्त्र की मानवीय यांत्रिकी मनुष्य के मस्तिष्क में
एक विद्युत् छोर लगा देगी . जब भावनात्मक आवश्यकता हो मात्र एक बटन दबाना होगा , जब
पति क्रोध में हो तो पत्नी उसे शांत करने के लिए एक बटन दबा दे या पत्नी को शांत करने
के लिए पति ऐसा ही कर दे .
इस प्रकार विश्व भर
में जैविक प्रयोगशालाएं स्थापित हो जायेंगी जो मानव मन को सुखी व शांत करने के लिए
प्रचुर सेवाएं देंगी . तब मनुष्य का क्या होगा ? वह एक पशु , एक वस्तु मात्र बन जाएगा
. इस भयानक सम्भावना को टाला जा सकता है , यदि हम ऋषियों द्वारा अनुमोदित क्रिया एवं
अध्ययन को अपनाएँ और अपने भीतरी जीवन की गहनतापूर्ण
क्रियाओं का अध्ययन करें, जिसे सर जूलियन हक्सले ने मानव संभावनावों
का विज्ञान कहा है . केवल यही अध्ययन एवं
विद्या वर्तमान युवकों / मनुष्यों को मूलतः शक्तिशाली बना सकती है .
वस्तुतः जगत में काम, क्रोध, लोभ व हिंसा फ़ैलाने के स्थान पर हमें प्रेम, शांति
व सेवा को वितरित करना सीखना होगा . मनुष्य के बाह्य जीवन का विस्तृत रूप से निष्कर्ष
है कर्म और उसके आंतरिक जीवन का निष्कर्ष है उसका स्वत्व. ऐसा ही मानव परिवर्तन वर्तमान
में आवश्यक है जिससे कि हम अपना ध्यान मनुष्य के भीतरी ऊर्जा के साधनों की खोज में
लगाते हुए अपना जीवन लक्ष्य निश्चित करे तो यह अत्यधिक श्रेयष्कर होगा .
Monday, November 26, 2012
'' माँ ''
१
...
माँ
तुम्हारे
भी तो कुछ सपने होंगे
भूलकर
सबकुछ
तुम
भी तो बुनना चाहती होगी अपनी दुनिया ..
आखिर
कब तक बुनोगी
मेरी
नाप का सूटर...
अब
तो आँखे भी कमजोर हो रही हैं तुम्हारी
फोन
पर कैसे बता दूं
छाती
और गले की माप ...
रोक
लो इन हाथो को
जो
नींद में अब भी बनाते हैं डिजाइन ....
बस
भी करो माँ
कुछ
तो बुनो अपने लिए
करती
हो जितना मेरे लिए ..
उसका
दशमलव अपने लिए
२
...
हम
न जाने कब बच्चे से बड़े हो गए
तेरी
छांव में ....
कितना
कुछ बदल गया है न माँ
तेरे
आँगन को तोड़कर
आकाश
समेटने चला हूँ ...
तब
भी तो तू नहीं मानती
मै
नहीं चाहता ऐसी छत
जिसमे
ढका हो तेरा आँगन ........
कैसे
भूल सकता हूँ
तुलसी
के सामने तेरा झुका सर
और
आंगन
में जलता दिया
उस
शीतल तपिश से पका है मेरा घर
जिसमे
जली है तू हर पल
दीपक
में बाती के समान...
३
.....
माँ
,
मै
हूँ तेरा कैनवास
चाहे
जो रूप दे लेना ...
छोडना
मत कोई जगह बेरंग
कहीं
उसमे कोई दाग न पड़ जाए ...
Subscribe to:
Posts (Atom)