Monday, November 26, 2012

'' माँ ''


१ ...
माँ
तुम्हारे भी तो कुछ सपने होंगे
भूलकर सबकुछ
तुम भी तो बुनना चाहती होगी अपनी दुनिया ..
आखिर कब तक बुनोगी
मेरी नाप का सूटर...
अब तो आँखे भी कमजोर हो रही हैं तुम्हारी
फोन पर कैसे बता दूं
छाती और गले की माप ...
रोक लो इन हाथो को
जो नींद में अब भी बनाते हैं डिजाइन ....
बस भी करो माँ
कुछ तो बुनो अपने लिए
करती हो जितना मेरे लिए ..
उसका दशमलव अपने लिए
२ ...
हम न जाने कब बच्चे से बड़े हो गए
तेरी छांव में ....
कितना कुछ बदल गया है न माँ
तेरे आँगन को तोड़कर
आकाश समेटने चला हूँ ...
तब भी तो तू नहीं मानती
मै नहीं चाहता ऐसी छत
जिसमे ढका हो तेरा आँगन ........
कैसे भूल सकता हूँ
तुलसी के सामने तेरा झुका सर
और 
आंगन में जलता दिया   

उस शीतल तपिश से पका है मेरा घर
जिसमे जली है तू हर पल
दीपक में बाती के समान...

३ .....
माँ ,
मै हूँ तेरा कैनवास
चाहे जो रूप दे लेना ...
छोडना मत कोई जगह बेरंग
कहीं उसमे कोई दाग न पड़ जाए ...

No comments:

Post a Comment