यहाँ इंसान नहीं रहते
रोक दे कोई इस काली बरसात को
रोक दे कोई इस काली बरसात को
कि भीगा नहीं हूँ
रोक दे कोई इस अंधेरी रात को
कि सोया नही हूँ ...
बंद कर दे कोई दरवाजे इन
खामोश गलियों के
कि अब कोई यहाँ आता-जाता नहीं ...
कि अब कोई यहाँ आता-जाता नहीं ...
ये इंसानों का घर नहीं
यहाँ की दीवारों पर दिखती हैं
सरकती छिपकलियाँ ...
उसपे लटकते जाले
और उन पर रेंगती मकड़ियाँ ...
लगता है
मानों मै हूँ उसका अगला शिकार
धंस गया हूँ
अजीब से दलदल में ...
पड़ा हूँ औंधे मुह..
चिल्लाने का स्वर भी नहीं
निकलता
मानों दाब लिया हो किसी ने
असीम शक्ति से ...
कि अब यहाँ इंसान नहीं रहते
...
बहुत ही खूबसूरत ...
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